ज़ीरो बजट खेती का मंत्र!


  केंद्रीय वित्तमंत्री ने जैसे ही बजट में ज़ीरो बजट खेती का जिक्र किया वैसे ही हर कोई कृषि वैज्ञानिक बनकर राय देने लग गया।एकाएक समर्थकों व आलोचकों के बीच संग्राम सा मच गया है!मुझे भी लगा कि इस बारे में जानकारी हासिल कर लेनी चाहिए तो मैंने भी भारत मे ज़ीरो बजट खेती पर सरसरी नजर मारी है!

ज़ीरो बजट खेती जैसी कोई खेती आज दुनियाँ में कहीं होती नहीं है।शायद दयानंद सरस्वती के नारे वेदों की और लौटो से प्रभावित होकर कुछ लोग जोश में वैदिक खेती का जिक्र कर गए हो मगर असल मे ज़ीरो बजट खेती आदिम युग की खेती है।उस समय बीज बोया नहीं जाता था बल्कि खरपतवार की तरह अपने आप उग जाता था और लोग उसका उपयोग खाद्य पदार्थों के रूप में कर लेते थे।यह युग मांसाहारी के बाद का युग था।

भारत मे ज़ीरो बजट खेती को लेकर कर्नाटक में कृषि ऋषि सुभाष पालेकर दावा कर रहे है कि उनकी तकनीक से एक लाख किसान खेती कर रहे है और उनकी आय बहुत ज्यादा बढ़ गई है!बड़े-बड़े सेमिनार कर रहे है और दावा कर रहे है कि मात्र एक गाय से 30एकड़ में ज़ीरो बजट वाली खेती हो सकती है!उन्होंने ज़ीरो बजट खेती को लेकर कई किताबें लिखी है और भारतीय भाषाओं में अनुवाद भी किया है।कृषि ऋषि पालेकर इसको आध्यत्मिक खेती भी कहते है!मैंने भी यूट्यूब व गूगल सर्च पर देखा है,जब एक-दो सेमिनार के वीडियो सुने तो ज़ीरो बजट वाला अतिशयोक्तिपूर्ण प्रवचन खुद ही ध्वस्त करते नजर आए।

जोधपुर के कृषि वैज्ञानिक अरुण के.शर्मा को भी पढ़ा।वो इसी ज़ीरो बजट खेती को जैविक खेती बताकर प्रचार-प्रसार करते नजर आएं।एक गाय व एक नीम के पेड़ को एक बीघा खेती के लिए पर्याप्त बता रहे है मतलब बीस बीघा खेती करनी है तो 20 गाय व 20नीम के पेड़ होने चाहिए।निम्बोलियों को एकत्रित करना होगा और घाणी लगाकर तेल व खल को अलग करना होगा!तेल छिड़काव के रूप में व खल खाद के रूप में उपयोग कर सकते है!

इनसे पहले स्वदेशी जागरण मंच वाले राजीव दीक्षित इसी प्रकार की खेती के बारे में बहुत रिसर्च करने का दावा करते थे मगर इस तरह की खेती को मुनाफे वाली बनाकर कोई मॉडल खड़ा नहीं कर पाएं और दुनियाँ से रुखसत हो गए!

वर्मीकम्पोस्ट,जीवामृत सहित गाय के गोबर व मूत्र द्वारा खाद बनाने की अनेकों विधियां बताई गई है।गौमाता में 33करोड़ देवी-देवता निवास करते है तो इतना तो पावर गोबर व मूत्र में होगा ही मगर असल बात यह है कि गाय का पालन ज़ीरो बजट में संभव नहीं है।

हमारी सरकारें असल मे रिसर्च व प्रासंगिकता पर कम व बाबाओं पर ज्यादा भरोसा करती है।इंदिरा गांधी के जमाने मे महर्षि महेश योगी जमावड़ा लेकर दिल्ली में बैठ गए और इंदिरा गांधी को भावातीत ध्यान व टी एम यज्ञ से चीन व पाकिस्तान सहित तमाम दुनियाँ के दुश्मनों का हृदय परिवर्तन करने का नुस्खा सीखाने लग गए!भला हो आचार्य रजनीश का कि वो उस समय जिंदा थे और इनको सफल नहीं होने दिया और इंदिरा गांधी को बता दिया कि परमाणु बम का मुकाबला परमाणु बम से ही होगा!

पिछली कांग्रेस सरकार ने उन्नाव के बाबा शोभन सरकार के कहने पर टनों हीरे-सोने के खजाने को निकालने के लिए पूरी ASI की टीम जेसीबी व बुलडोजर के साथ भेज दी थी!

जब भी भारत की सरकारें ऐसे मूर्खतापूर्ण व मूढ़ताओं से भरे निर्णय लेती है तो मेरा माथा ठिठक जाता है कि किसी बाबा ने जरूर सलाह दी होगी जैसे बाबा रामदेव ने आयकर को खत्म करने व कालाधन लाकर देश की कायापलट का नुस्खा दिया था!

जब शाम को ध्यान से मैंने वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण का भाषण सुना तो एकबार तो हंसी आई क्योंकि यह जेएनयू पास मंत्री है जहां के छात्र कभी गैर तार्किक बात बोलते नहीं है मगर दूसरे पल ही शपथग्रहण के धार्मिक नारों को याद करके माथा पीट लिया कि कीर्तन सभा मे बाबा सलाहकार नहीं होंगे तो कौन होंगे!

मोदी सरकार को ज़ीरो बजट वाली खेती का आईडिया आरएसएस से प्रशिक्षित व कुरुक्षेत्र हरियाणा के गुरुकुल के बाबा आचार्य देवव्रत ने दिया है और उनकी इसी काबिलियत को देखते हुए हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया है।200एकड़ जमीन पर ज़ीरो बजट वाली खेती करके उन्होंने मुनाफा ही मुनाफा कमाया है जैसा दावा किया जा रहा है और अब तक 5000हिमाचल के किसानों को यह खेती सीखा चुके है व लक्ष्य 50हजार किसानों को सीखाने का रखा है।

बताया जा रहा है कि कई राज्यों के मुख्यमंत्री व कई केंद्रीय मंत्री इनके गुरुकुल में जाकर प्रशिक्षण ले चुके है और इसी साल 4जनवरी को प्रधानमंत्री मोदी व उनकी टीम के सामने प्रेजेंटेशन दिया है! मोदीजी को यह आईडिया बहुत पसंद आया था और इसको बजट में शामिल कर लिया गया है!

इनकी जीरो बजट खेती का खर्चा बस इतना सा है कि एक एकड़ जमीन के लिए जैविक खाद जीवामृत बनाने के लिए 200 लीटर पानी में 10 किलो देसी गाय का गोबर, 10 लीटर गोमूत्र, एक से डेढ़ किलो गुड़, एक से डेढ़ किलो बेसन, थोड़ी खेत की मिट्टी मिलाकर इसका एक घोल बनाया जाता है। घोल को एक टंकी में रखकर दो-तीन मिनट तक हिलाएं और इसके बाद इसे बोरी से ढक कर 72 घटे के लिए छांव में रख दें। सुबह शाम घोल को दो-दो मिनट के लिए हिलाते रहें। इस घोल को सप्ताह के अंदर प्रयोग कर लेना होगा!

बड़ी सुंडियों व इल्लियों के खात्मे के लिए भी आचार्य ने ब्रह्मास्त्र तैयार किया है। इसके लिए देसी गाय का मूत्र 10 लीटर, नीम के पत्ते पांच किलोग्राम, आम, अमरूद, नीम व पपीते के पत्तों की चटनी दो-दो किलोग्राम। वनस्पतियों के पत्तों की चटनी को गोमूत्र डालकर धीमी आंच पर उबाल आने तक गर्म करें। 48 घटे के लिए ठंडा होने के लिए रख दें। ढाई से तीन लीटर घोल को 100 लीटर पानी में मिला लें और एक एकड़ फसल पर इसका उपयोग करें!

आप नीम,आम,अमरूद,पपीते के पतों का जुगाड़ शुरू करिये और चटनी बना लीजिए!आवारा गायों को अभी से पकड़ना शुरू कर दीजिए नहीं तो आने वाले दिनों में गाय को लेकर महाभारत शुरू होगा ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार 5-10बीघा जमीन के लिए कौरव-पांडव लड़ पड़े।मतलब कुरुक्षेत्र से शुरू और कुरुक्षेत्र में ही खत्म!

पते की बात यही है कि चोर को कोई बड़ा डाका डालना हो तब वह बस्ती वालों के मनोरंजन खातिर कुछ शगूफा छोड़ देता है!भूमि अधिग्रहण बिल व 75हजार कृषि उद्यमियों/दलालों की नियुक्ति पर नजर बनाए रखिये!सिंचाई,बिजली,ट्रेक्टर,बीज आदि के बिना कोई खेती संभव नहीं है इसलिए इस ज़ीरो बजट वाली मूर्खता में उलझकर मत बैठ जाना नहीं तो जमीनें ही खो बैठोगे!

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